क्या कोरोना की आयुर्वेदिक दवा “कोरोनिल” लॉन्च कर के बाबा रामदेव और...

क्या कोरोना की आयुर्वेदिक दवा “कोरोनिल” लॉन्च कर के बाबा रामदेव और पतंजलि ने देश को झांसा दिया है?

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क्या कोरोना की आयुर्वेदिक दवा “कोरोनिल” लॉन्च कर के बाबा रामदेव और पतंजलि ने देश को झांसा दिया है?

स्वामी रामदेव की पतंजलि द्वारा कोई झांसा नहीं दिया गया है। भारत में हम हमेशा ही इस हीन भावना से ग्रसित रहते हैं कि इतनी अच्छी चीजें भारत में कैसे हो सकती हैं ? और वह भी स्वदेशी प्रयासों से ? हमें अपने और अपनों पर विश्वाश नहीं है .

हममें से ज्यादातर लोग यही सोचते हैं कि सिर्फ पश्चिम के लोग ही उत्कृष्ट काम कर सकते हैं और हमें उनके पिछलग्गू बनने की आदत हो गई है.

कोरोनिल को आयुष मंत्रालय से कोरोना की दावा के रूप में अनुमति नहीं मिली है. पतंजलि ने वांछित जानकारी अब प्रेषित कर दी है जिस पर मंत्रालय विचार करेगा . अगर कोरोनिल निर्धारित मापदंडों पर खरी उतरती है तो उसे अनुमति जरूर मिलेगी. मंत्रालय ने कोरोनिल को कोरोना की दवा के रूप में प्रचारित करने से मना किया है लेकिन इसकी विक्रय पर प्रतिबन्ध नहीं लगाया है. फिरभी पतंजलि के विरुद्ध एक तरह से छद्म युद्ध शुरू हो गया है.

कोरोनिल का विश्लेषण करने से पहले, हमें कोरोना संक्रमण के घटनाक्रम को एक बार याद कर लेना चाहिए. 22 मार्च 2020 को लॉक डाउन घोषित किया गया था, और लोग अपने घरों तक ही सीमित हो गए थे। बहुत आपात स्थिति के अलावा कोई बाहर नहीं जा रहा था। इस अवधि के दौरान सभी आर्थिक गतिविधियाँ पंगु हो गईं। सभी सरकारी अस्पताल केवल कोविड -19 के उपचार के लिए काम कर रहे थे और ओपीडी बंद थे। निजी अस्पताल / नर्सिंग होम या तो बंद थे या रोगी नहीं आ रहे थे। इन अस्पतालों को सरकार द्वारा सलाह दी गई थी कि वे कोविड -19 अस्पताल बनने के लिए तैयार रहें.

प्रधानमंत्री मोदी नियमित रूप से लोगों से घर में रहने और गंभीर आपात स्थिति को छोड़कर अस्पतालों में नहीं जाने का अनुरोध कर रहे थे। पीएम ने इस अवधि के दौरान मामूली सर्जरी और चेकअप को रोकने का भी अनुरोध किया। इस संबंध में सोशल मीडिया, टीवी, रेडियो पर लगातार संदेश आ रहे थे। इस सब ने लोगों को प्रभावित किया और लोगों ने यही किया।

*क्या असर पड़ा?*

डॉक्टर्स / हॉस्पिटल्स / नर्सिंग होम्स में लोगों का जाना बंद हो गया
डॉक्टरों के साथ परामर्श लगभग बंद हो गया
दवाओं की बिक्री में तेज गिरावट
छोटी – छोटी स्वास्थ्य समस्याओं में तेज गिरावट
रोगियों की संख्या में भारी गिरावट
सभी परिवारों के मेडिकल बिल में भारी गिरावट

*ऐसा क्यों हुआ है?*

जिस को रोका जा सकता था उसे रोका गया
ध्यान
योग
शारीरिक व्यायाम
आम आदमी की प्रतिरक्षा प्रणाली में सुधार
पारंपरिक चीजों, मसालों और आयुर्वेदिक चीजों की मदद से घर पर निवारक उपचार का उपयोग बढ़ा
सभी परिवारों के सामान्य स्वास्थ्य स्तर में सुधार

*इस सबके क्या परिणाम निकले ?*

अधिकांश डॉक्टरों, नर्सिंग होम और निजी अस्पतालों की कमाई में भारी कमी
मेडिकल स्टोर, फार्मासिस्ट और फार्मा कंपनियों की कमाई में तेजी से गिरावट
हम सबको अपने को परखने के मौका मिला और ये विश्वास हो गया है कि छोटी छोटी स्वास्थ्य समस्याओं को घरेलू उपचार से ठीक किया जा सकता है । इनके लिए डॉक्टर के पास भागने की जरूरत नहीं । लेकिन लोगों को जमकर लूटने वाले एक उद्योग को ये बिल्कुल अच्छा नही लगा।

भारत में हेल्थ केयर सिस्टम में बहुत पहले से एक बड़ा रैकेट चल रहा है . इसमें कुछ फार्मा कंपनी, कुछ डॉक्टर, कुछ मेडिकल स्टोर, कुछ फार्मेसी, कुछ प्राइवेट व् कुछ सरकारी अस्पताल और कुछ नर्सिंग होम सभी मिले हुए हैं. इस सब का खामियाजा आम आदमी को भुगतना पड़ता है जो अपनी मेहनत की कमाई का एक बड़ा भाग बेहद मजबूरी और बेबसी में इस बेरहम नेटवर्क के हवाले कर देता है.

आयुर्वेद के लिए संक्षेप में कहें तो यह प्रणाली पुराने समय से एक जांची परखी प्रणाली है, जो वर्तमान में गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए, विशेष रूप से सर्जरी आदि के लिए सक्षम नहीं है क्योंकि इसमें बहुत लंबे अरसे से नए अविष्कारों पर सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया है. फिर भी यह घर पर रहते हुए बेहद पारदर्शी तरीके से कई बीमारियों को रोक सकती है। हम सभी जानते हैं कि कई आयुर्वेदिक उपचार घर पर किए जा सकते हैं और वास्तव में कई चीजें तो ऐसी हैं जो प्राचीन काल से हम अपने घरों में किसी न किसी रूप में उपयोग करते आ रहे हैं।

वर्तमान संदर्भ में, आयुष मंत्रालय ने कोरोना संक्रमण के एक निवारक उपाय के रूप में तुलसी, हल्दी, दालचीनी, गिलोय आदि के उपयोग की सिफारिश की है। आयुष चाय या काढ़ा आयुष मंत्रालय ने ही प्रचारित किया है और बिल्कुल सही किया है . अब अगर स्वामी रामदेव दावा कर रहे हैं कि कोरोनिल और स्वसारी दवाओं में ये सभी आयुर्वेदिक दवाएं शामिल हैं, तो इसके लिए कौन से बड़े शोध की आवश्यकता है?

ये आयुर्वेदिक दवाएं कोरोना के गंभीर रोगियों को ठीक करने की स्थिति में भले ही न हों लेकिन यह कम लक्षणों वाले रोगियों को ठीक कर सकती हैं क्योकि ये रोग प्रतिरोधक क्षमता बढाने वाली दावा है .

आज भी अगर हम विश्लेषण करें तो पाते हैं कि अधिकांश कोविड मरीज अपनी आंतरिक प्रतिरोधक क्षमता के कारण ही ठीक हो रहे हैं, दवाइयों आदि के कारण नहीं। अच्छी प्रतिरक्षा प्रणाली वाले कई संक्रमित लोग घर पर बहुत अधिक समस्याओं के बिना ठीक हो गए हैं और कई लोग इस संक्रमण को आयुर्वेदिक वस्तुएं अपनाने के कारण रोकने में सफल हुए हैं. यह सब सरकार के रिकॉर्ड में नहीं है।

हमें पूरा विश्वास है कि कोरोनिल एक झांसा नहीं हो सकता है, और झांसा देकर बाबा रामदेव या पतंजलि को क्या मिल जाएगा। आखिर यह दवा बहुत महंगी नहीं है. यह एक ऐसी दवा है जिसे कोरोना के हल्के लक्षणों वाले रोगियों को लेना चाहिए। पतंजलि भी दावा नहीं करती है कि उनकी यह दवा सभी गंभीर रोगियों को ठीक कर सकती है।

ग्लेनमार्क की बनी हुई एक एलोपैथिक दवा भी बाजार में आ गई है, जिसकी लागत प्रति टैबलेट 103 रुपये है और कोर्स 3500 रुपये में है। पतंजलि के कोरोनिल आयुर्वेदिक दवा की कीमत एक महीने के लिए 545 रुपये है। यह अंतर है. यह सही है कि पतंजलि ने आयुष मंत्रालय द्वारा निर्धारित औपचारिकता पूरी नहीं की जो अब की जा रही है. आज की तारीख में इसका लाइसेंस रोग प्रतिरोधक क्षमता बढाने की दवा का है .

*आखिर समस्या क्या है ?*

यह एक कम खर्च वाली दवा है है, जो मध्यम और निम्न वर्ग के बजट के लिए उपयुक्त है।

मैं यह नहीं कह रहा हूं कि सरकार पर कोरोनिल आयुर्वेदिक दवा को मान्यता न देने के लिए बड़ी फार्मा कंपनियों का दबाव है, लेकिन आयुष मंत्रालय को इस पर ध्यान देना चाहिए और पतंजलि के साथ सहयोग और समन्वय करने के लिए सक्रिय होना चाहिए। अंतत: यदि यह परियोजना सफल हो जाती है, तो आयुर्वेद को दुनिया भर में नाम और प्रसिद्धि मिलेगी। इससे एग्री सेक्टर में कई नौकरियां पैदा हो सकती हैं।

फिर भारत सरकार और आयुष मंत्रालय एक तरफा और अनिर्णय की स्थिति में में काम क्यों कर रहे हैं?
अगर आयुष मंत्रालय आयुर्वेद के प्रचार और प्रसार में सक्रिय भूमिका नहीं निभा सकता तो फिर उसका क्या काम है ?
भारत में हम हमेशा ही हीन भावना से ग्रस्त रहते हैं कि हम इतना अच्छा काम कैसे कर सकते हैं ? हम इस पराजित और गुलामी की मानसिकता से बाहर निकलना होगा.

इस पराजित मानसिकता के साथ, तो हम स्वास्थ्य सेवा, रक्षा, शिक्षा और अन्य आधुनिक प्रणालियों के लिए हमेशा पश्चिमी देशों के गुलाम बने रहेंगे.

भला दूसरे देशों पर निर्भर रहते हुए, कोई देश आत्मनिर्भर हो सकता है?

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*27 जून को अपडेट किया गया*

*क्या कोरोना की आयुर्वेदिक दवा “कोरोनिल” लॉन्च कर के बाबा रामदेव और पतंजलि ने देश को झांसा दिया है?*

स्वामी रामदेव की पतंजलि द्वारा कोई झांसा नहीं दिया गया है। भारत में हम हमेशा ही इस हीन भावना से ग्रसित रहते हैं कि इतनी अच्छी चीजें भारत में कैसे हो सकती हैं ? और वह भी स्वदेशी प्रयासों से ? हमें अपने और अपनों पर विश्वाश नहीं है।

हममें से ज्यादातर लोग यही सोचते हैं कि सिर्फ पश्चिम के लोग ही उत्कृष्ट काम कर सकते हैं और हमें उनके पिछलग्गू बनने की आदत हो गई है।

कोरोनिल को आयुष मंत्रालय से कोरोना की दावा के रूप में अनुमति नहीं मिली है। पतंजलि ने वांछित जानकारी अब प्रेषित कर दी है जिस पर मंत्रालय विचार करेगा। अगर कोरोनिल निर्धारित मापदंडों पर खरी उतरती है तो उसे अनुमति जरूर मिलेगी। मंत्रालय ने कोरोनिल को कोरोना की दवा के रूप में प्रचारित करने से मना किया है लेकिन इसकी विक्रय पर प्रतिबन्ध नहीं लगाया है। फिरभी पतंजलि के विरुद्ध एक तरह से छद्म युद्ध शुरू हो गया है।

कोरोनिल का विश्लेषण करने से पहले, हमें कोरोना संक्रमण के घटनाक्रम को एक बार याद कर लेना चाहिए। 22 मार्च 2020 को लॉक डाउन घोषित किया गया था, और लोग अपने घरों तक ही सीमित हो गए थे। बहुत आपात स्थिति के अलावा कोई बाहर नहीं जा रहा था। इस अवधि के दौरान सभी आर्थिक गतिविधियाँ पंगु हो गईं। सभी सरकारी अस्पताल केवल कोविड -19 के उपचार के लिए काम कर रहे थे और ओपीडी बंद थे। निजी अस्पताल / नर्सिंग होम या तो बंद थे या रोगी नहीं आ रहे थे। इन अस्पतालों को सरकार द्वारा सलाह दी गई थी कि वे कोविड -19 अस्पताल बनने के लिए तैयार रहें।

प्रधानमंत्री मोदी नियमित रूप से लोगों से घर में रहने और गंभीर आपात स्थिति को छोड़कर अस्पतालों में नहीं जाने का अनुरोध कर रहे थे। पीएम ने इस अवधि के दौरान मामूली सर्जरी और चेकअप को रोकने का भी अनुरोध किया। इस संबंध में सोशल मीडिया, टीवी, रेडियो पर लगातार संदेश आ रहे थे। इस सब ने लोगों को प्रभावित किया और लोगों ने यही किया।

*क्या असर पड़ा?*

डॉक्टर्स / हॉस्पिटल्स / नर्सिंग होम्स में लोगों का जाना बंद हो गया
डॉक्टरों के साथ परामर्श लगभग बंद हो गया
दवाओं की बिक्री में तेज गिरावट
छोटी – छोटी स्वास्थ्य समस्याओं में तेज गिरावट
रोगियों की संख्या में भारी गिरावट
सभी परिवारों के मेडिकल बिल में भारी गिरावट

*ऐसा क्यों हुआ है?*

जिस को रोका जा सकता था उसे रोका गया
ध्यान
योग
शारीरिक व्यायाम
आम आदमी की प्रतिरक्षा प्रणाली में सुधार
पारंपरिक चीजों, मसालों और आयुर्वेदिक चीजों की मदद से घर पर निवारक उपचार का उपयोग बढ़ा
सभी परिवारों के सामान्य स्वास्थ्य स्तर में सुधार

*इस सबके क्या परिणाम निकले ?*

अधिकांश डॉक्टरों, नर्सिंग होम और निजी अस्पतालों की कमाई में भारी कमी
मेडिकल स्टोर, फार्मासिस्ट और फार्मा कंपनियों की कमाई में तेजी से गिरावट
हम सबको अपने को परखने के मौका मिला और ये विश्वास हो गया है कि छोटी छोटी स्वास्थ्य समस्याओं को घरेलू उपचार से ठीक किया जा सकता है । इनके लिए डॉक्टर के पास भागने की जरूरत नहीं । लेकिन लोगों को जमकर लूटने वाले एक उद्योग को ये बिल्कुल अच्छा नही लगा।

भारत में हेल्थ केयर सिस्टम में बहुत पहले से एक बड़ा रैकेट चल रहा है। इसमें कुछ फार्मा कंपनी, कुछ डॉक्टर, कुछ मेडिकल स्टोर, कुछ फार्मेसी, कुछ प्राइवेट व् कुछ सरकारी अस्पताल और कुछ नर्सिंग होम सभी मिले हुए हैं। इस सब का खामियाजा आम आदमी को भुगतना पड़ता है जो अपनी मेहनत की कमाई का एक बड़ा भाग बेहद मजबूरी और बेबसी में इस बेरहम नेटवर्क के हवाले कर देता है।

आयुर्वेद के लिए संक्षेप में कहें तो यह प्रणाली पुराने समय से एक जांची परखी प्रणाली है, जो वर्तमान में गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए, विशेष रूप से सर्जरी आदि के लिए सक्षम नहीं है क्योंकि इसमें बहुत लंबे अरसे से नए अविष्कारों पर सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया है। फिर भी यह घर पर रहते हुए बेहद पारदर्शी तरीके से कई बीमारियों को रोक सकती है। हम सभी जानते हैं कि कई आयुर्वेदिक उपचार घर पर किए जा सकते हैं और वास्तव में कई चीजें तो ऐसी हैं जो प्राचीन काल से हम अपने घरों में किसी न किसी रूप में उपयोग करते आ रहे हैं।

वर्तमान संदर्भ में, आयुष मंत्रालय ने कोरोना संक्रमण के एक निवारक उपाय के रूप में तुलसी, हल्दी, दालचीनी, गिलोय आदि के उपयोग की सिफारिश की है। आयुष चाय या काढ़ा आयुष मंत्रालय ने ही प्रचारित किया है और बिल्कुल सही किया है। अब अगर स्वामी रामदेव दावा कर रहे हैं कि कोरोनिल और स्वसारी दवाओं में ये सभी आयुर्वेदिक दवाएं शामिल हैं, तो इसके लिए कौन से बड़े शोध की आवश्यकता है?

ये आयुर्वेदिक दवाएं कोरोना के गंभीर रोगियों को ठीक करने की स्थिति में भले ही न हों लेकिन यह कम लक्षणों वाले रोगियों को ठीक कर सकती हैं क्योंकि ये रोग प्रतिरोधक क्षमता बढाने वाली दावा है।

आज भी अगर हम विश्लेषण करें तो पाते हैं कि अधिकांश कोविड मरीज अपनी आंतरिक प्रतिरोधक क्षमता के कारण ही ठीक हो रहे हैं, दवाइयों आदि के कारण नहीं। अच्छी प्रतिरक्षा प्रणाली वाले कई संक्रमित लोग घर पर बहुत अधिक समस्याओं के बिना ठीक हो गए हैं और कई लोग इस संक्रमण को आयुर्वेदिक वस्तुएं अपनाने के कारण रोकने में सफल हुए हैं। यह सब सरकार के रिकॉर्ड में नहीं है।

हमें पूरा विश्वास है कि कोरोनिल एक झांसा नहीं हो सकता है, और झांसा देकर बाबा रामदेव या पतंजलि को क्या मिल जाएगा। आखिर यह दवा बहुत महंगी नहीं है। यह एक ऐसी दवा है जिसे कोरोना के हल्के लक्षणों वाले रोगियों को लेना चाहिए। पतंजलि भी दावा नहीं करती है कि उनकी यह दवा सभी गंभीर रोगियों को ठीक कर सकती है।

ग्लेनमार्क की बनी हुई एक एलोपैथिक दवा भी बाजार में आ गई है, जिसकी लागत प्रति टैबलेट 103 रुपये है और कोर्स 3500 रुपये में है। पतंजलि के कोरोनिल आयुर्वेदिक दवा की कीमत एक महीने के लिए 545 रुपये है। यह अंतर है। यह सही है कि पतंजलि ने आयुष मंत्रालय द्वारा निर्धारित औपचारिकता पूरी नहीं की जो अब की जा रही है। आज की तारीख में इसका लाइसेंस रोग प्रतिरोधक क्षमता बढाने की दवा का है।

*आखिर समस्या क्या है ?*

यह एक कम खर्च वाली दवा है है, जो मध्यम और निम्न वर्ग के बजट के लिए उपयुक्त है।

मैं यह नहीं कह रहा हूं कि सरकार पर कोरोनिल आयुर्वेदिक दवा को मान्यता न देने के लिए बड़ी फार्मा कंपनियों का दबाव है, लेकिन आयुष मंत्रालय को इस पर ध्यान देना चाहिए और पतंजलि के साथ सहयोग और समन्वय करने के लिए सक्रिय होना चाहिए। अंतत: यदि यह परियोजना सफल हो जाती है, तो आयुर्वेद को दुनिया भर में नाम और प्रसिद्धि मिलेगी। इससे एग्री सेक्टर में कई नौकरियां पैदा हो सकती हैं।

फिर भारत सरकार और आयुष मंत्रालय एक तरफा और अनिर्णय की स्थिति में में काम क्यों कर रहे हैं?
अगर आयुष मंत्रालय आयुर्वेद के प्रचार और प्रसार में सक्रिय भूमिका नहीं निभा सकता तो फिर उसका क्या काम है ?
भारत में हम हमेशा ही हीन भावना से ग्रस्त रहते हैं कि हम इतना अच्छा काम कैसे कर सकते हैं ? हम इस पराजित और गुलामी की मानसिकता से बाहर निकलना होगा।

इस पराजित मानसिकता के साथ, तो हम स्वास्थ्य सेवा, रक्षा, शिक्षा और अन्य आधुनिक प्रणालियों के लिए हमेशा पश्चिमी देशों के गुलाम बने रहेंगे।

भला दूसरे देशों पर निर्भर रहते हुए, कोई देश आत्मनिर्भर हो सकता है?